भगवान श्रीराम का राजतिलक और विष्णु का मत्स्य अवतार भी इसी दिन हुआ था
आज से देश भर में नवरात्रि शुरू
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भगवान श्रीराम का राजतिलक और विष्णु का मत्स्य अवतार भी इसी दिन हुआ था

– NDI24 नेटवर्क

नई दिल्ली. आज से चैत्र नवरात्र की शुरुआत हो रही है और नवरात्र से ही हिंदू नव वर्ष शुरू हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन सृष्टि की भी रचना हुई थी। मान्यता है कि इसी दिन लोग अपने शुभ काम करते हैं। भगवान श्रीराम और धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक इसी दिन हुआ था। कहा तो ये भी जाता है कि भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार इसी दिन हुआ था।

यहां जानिए नव वर्ष की कई कहानियां…

  • जब सृष्टि की रचना हुई तब सतयुग का आरंभ हुआ। जब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर धरती की स्थापना की। तब भगवान राम का राजतिलक हुआ। जब युधिष्ठिर ने राजपाठ संभाला तब चैत्र के नवरात्र आते हैं। ठीक उसी दिन से हिंदू नए साल की शुरुआत हुई। दुनिया में पहली जनवरी को नए साल के रूप में मनाया जाता है। लेकिन भारत में चैत्र महीने के पहले दिन नये साल के तौर पर मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, चैत्र के नवरात्र के पहले दिन आदि शक्ति प्रकट हुई थीं और उन्हीं के कहने पर भगवान ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल के पहले दिन सूर्योदय के वक्त सृष्टि का निमाज़्ण किया। इसलिए इसी दिन सृष्टि के उत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है। कहा तो ये भी जाता है कि सतयुग की शुरुआत भी इसी दिन से हुई थी। चेत्र नवरात्र के तीसरे दिन भगवान विष्णु ने मतस्य रूप में पहला अवतार लिया और धरती की स्थापना की और चैत्र के नवरात्र में ही भगवान विष्णु का सातवां अवतार भगवान राम के रूप में हुआ था। चैत्र महीने का पहले दिन काफी शुभ माना जाता है, यानी किसी भी काम की शुरुआत इसी दिन से की जाती है।
  • मान्यता है कि सृष्टि की रचना शुरू होने से पहले पूरे ब्रह्मांड में अंधकार ही अंधकार था। कहीं कुछ भी नहीं था। ऐसे में मां आदि शक्ति ने ही सबसे पहले सृष्टि की रचना के बारे में सोचा। उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा। विष्णु और महेश को प्रकट किया। इन तीनों के बाद सरस्वती। लक्ष्मी और मां काली की उत्पत्ति हुई। इसके बाद सृष्टि के विस्तार के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्माजी को सरस्वती। भगवान विष्णु को लक्ष्मी और भोलेनाथ को देवी काली सौंप दी। सृष्टि के निर्माण की शुरुआत के लिए भगवान ब्रह्मा ने चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा का दिन ही चुना। यहीं वजह है कि कि नए संवत्सर की शुरुआत और नव वर्ष का आरंभ इसी दिन से माना जाता है। अब सवाल ये है कि आखिर नवरात्र का नए साल से क्या संबंध है। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा को आदि देवी की कृपा से सृष्टि की रचना में सफलता मिली। इसलिए चैत्र के पहले दिन से नौ दिन तक मां शक्ति के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और आदि शक्ति की पूजा कर उन्हें धन्यवाद दिया जाता है।
  • हिंदू मान्यता के अनुसार युगों को चार युग में बांटा जाता है… सतयुग… त्रेतायुग… द्वापरयुग और कलयुग। मान्यता है कि सबसे पहले युग सतयुग का आरंभ भी चैत्र मास से ही हुआ। अब आपको बताते हैं कि आखिर सतयुग है क्या? सतयुग की उम्र 17 लाख 28 हजार साल की मानी जाती है। इसी युग में सबसे ज्यादा अवतार हुए। सतयुग में ही मतस्य… कूर्म…बाराह नरसिह ने धरती पर अवतार लिया था। कहा जाता है कि शंखासुर… वेदों का उद्धार… धरती का वजन कम करना… हरिण्याक्ष दैंत्य का वध भी इसी युग में माना जाता है। सतयुग के बाद त्रेतायुग का आरंभ हुआ…। इस युग की आयु 12 लाख 96 हजार साल की मानी जाती है। इस युग में लोग नैमिषारण्य का तीर्थ करते थे…। त्रेता युग में वामन… परशुराम और भगवान राम का अवतार हुआ था… त्रेतायुग में ही भगवान विष्णु ने वामन का अवतार लेकर राजा बलि का उद्धार किया… फिर भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का संहार किया… साथ ही भगवान राम ने रावण का भी वध किया था…।
  • त्रेतायुग के बाद द्वापरयुग की शुरूआत हुई… द्वापर युग में ही भगवान भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण का अवतार लिया था… और कंस का संहार किया था… द्वापर युग की आयु 8 लाख 64 हजार साल की मानी जाती थी… इस युग में इंसानों की उम्र 1 हजार साल की मानी जाती थी…
  • आखिरी युग कलयुग जो आज तक जारी है। कलयुग की आयु 4 लाख 32 हजार साल की मानी जा रही है। कलयुग में इंसानों की उम्र बेहद कम है और सिर्फ 100 साल की मानी जाती है कि कहा जा रहा है कि इस युग में भगवान कल्कि का अवतार होगा जो मानव जाति के उद्धार और अधर्मियों का विनाश करेंगे। साथ ही धर्म की रक्षा करेंगे।
  • हिंदू देवी देवताओं की संख्या 33 करोड़ मानी जाती है। सभी के अलग-अलग काम भी माने जाते हैं। कहा जाता है कि नव वषज़् के मौके पर ही सारे देवी देवताओं ने सृष्टि के संचालन का काम संभाला था… आइए आपको बताते हैं कि किस देवता का क्या काम है…
  • भगवान ब्रह्मा को जन्म देने वाला माना जाता है। क्योंकि उन्होंने ही सृष्टि की रचना की थी। भगवान विष्णु को पालन हार या लोगों का पालन-पोषण करने वाला कहा जाता है। भगवान भोलेनाथ को मृत्युदाता माना जाता है।
  • इंद्र भगवान का काम बारिश करना है। भगवान इंद्र के बाद अग्निदेव को मान्यता दी जाती है। देवाताओं को दी जाने वाली अग्नि आहुतियां भगवान अग्नि से ही दी जाती हैं।
  • कहा जाता है कि बहुत सी ऐसी आत्माएं हैं जिनका शरीर अग्निरूप में है लेकिन प्रकाश में नहीं। भगवान सूर्य देव को जगत की आत्मा कहा जाता है।
  • सूर्य दुनिया के समस्त प्राणियों को जीवनदान देते हैं। सूर्य के बाद वायु का दर्जा है। वायु को पवनदेव भी कहा जाता है। उनके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। बिना हवा से जीवन पल भर में खत्म हो सकता है। वरुण को जल का देवता कहा जाता है। उनकी गणना देव और दैंत्यों दोनों में ही की जाती है। यमराज मृत्यु के देवता हैं। कुबेर को धन का देवता कहा जाता है।

  • दुनिया की रक्षा के लिए भगवान तरह-तरह के अवतार लेकर धरती पर अवतरित हुए। फिर जब हिंदु नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। ठीक उसी वक्त भगवान विष्णु का मतस्य अवतार धरती पर प्रकट हुआ। भगवान विष्णु का ये सबसे पहला अवतार था। जब धरती पानी में डूबी हुई थी ठीक उसी वक्त भगवान विष्णु ने मछली के रूप में अवतार लिया। कहा जाता है कि उस वक्त उन्होंने एक ऋषि को सभी जीव और जन्तुओं को एकत्रित करने को कहा। फिर भगवान विष्णु ने ही उस ऋषि की नाव की रक्षा की थी। इसी के बाद से जीवन का फिर से निर्माण शुरू हुआ। कहा ये भी जाता है कि जब एक राक्षस ने वेदों को चुराकर सागर की गहराईयों में छिपा दिया था। ठीक उसी वक्त भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण करके वेदों को रक्षा की थी।
  • त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने भगवान श्रीराम का अवतार लिया था. भगवान राम का जन्म राजा दशरथ के घर अयोध्या में हुआ था..भगवान राम को 14 साल का वनवास हुआ था.. वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने कई राक्षसों का वध किया..उन्होंने लंका जाकर रावण को भी मारा था.. 14 साल के वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो उनको राजपाठ सौंप दिया गया…जिस दिन उनका राजतिलक हुआ वो दिन हिंदु नववषज़् यानी चैत्र की पहली तारीख ही थी… सबसे पहले वशिष्ठ मुनि ने उनका राजतिलक किया..इसके बाद गुरु वशिष्ठ ने बाकी ब्राह्मणों को भी श्रीराम का तिलक करने का आदेश दिया..कहा जाता है कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का शासन करीब 11 हजार सालों तक रहा..
  • किसी भी नवीन ‘संवत’ को चलाने की शास्त्रीय विधि ये है। बताया जाता है कि राजा को अपना संवत चलाने से पहले कम से कम अपने पूरे राज्य के सभी लोगों का कर्ज चुका देना होता था। कहा जाता है कि विक्रमादित्य ने भी अपने राज्य के सभी लोगों का कर्ज चुका दिया था, जिसके बाद उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत की।
  • हर धर्म में अपना नया साल और नया कैलेंडर होता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र मास की पहली तारीख से नए साल की शुरुआत होती है। इसके अलावा इस्लाम, पारसी, सिंधी, सिख, जैन और ईसाई धर्म में भी कैलेंडर है, जिसके अनुसार ये लोग भी अपना नया साल मनाते हैं।
  • ईसाई धर्म में 1 जनवरी को नए साल के तौर पर मनाया जाता है। करीब 4 हजार साल पहले बेबीलोन में 21 मार्च को नया साल मनाया जाता था, लेकिन उस वक्त रोम के तानाशाह जूलियस सीजर ने जूलियन कैलेंडर की स्थापना की। उसी दिन से दुनिया में 1 जनवरी को नया साल मनाया जाने लगा।
  • सिख धर्म में नए साल को वैशाखी के पवज़् के रूम में मनाया जाता है, जो अप्रैल के महीने में आती है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम महीने की पहली तारीख को नया साल होता है। हालांकि इस्लामिक या हिजरी कैलेंडर एक चंद्र कैलेंडर है जिसका इस्तेमाल दुनियाभर के मुस्लिम लोग धार्मिक पर्व मनाने के लिए सही समय जानने के लिए करते हैं। पारसी लोग नवरोज को नए साल के रूप में मनाते हैं। जैन धर्म में नया साल दीपावली के अगले दिन आता है।
  • सिंधी नव वर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरू होता है, जो चैत्र शुक्ल की द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था।

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